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Wednesday, 3 January 2018

खुद को वक्त दें

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानव कहीं खो-सा गया है। वह हर समय किसी न किसी काम में उलझा रहता है, इस वजह से वह चिंता व तनाव से ग्रस्त रहता है। विडंबना यह है कि हर व्यक्ति जीवन में सफलता की बुलंदियों को छूना तो  चाहता है किंतु वह खुद को वक्त देना ज़रूरी नहीं समझता जबकि आत्मविकास के लिए यह पहली शर्त है।

कुछ लोग यह प्रश्न कर सकते हैं कि स्वयं को समय देना इतना ज़रूरी क्यों है? इसके लिए हमारे पास समय ही कहाँ है ? बस, इसी प्रश्न में इसका उत्तर भी छिपा है।
जब हमारे पास खुद के लिए समय नहीं है तो इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हम हमारी ज़िंदगी में खुद को महत्त्व नहीं देते अर्थात हमें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हम क्या सोचते हैं, हमें क्या करना चाहिए व क्या नहीं। यदि हम ही खुद को महत्त्व नहीं देंगे तो भला और कोई कैसे हमें महत्त्व देगा। शुरूआत तो हमें ही करनी होगी। हमें ही स्वयं चिंतन-मनन करके खुद की अच्छाइयों व बुराइयों का पता लगाना होगा और उनके अनुसार जीवन को सुधारकर बेहतर जीवन की नींव रखनी होगी।

यदि हम इतिहास के पन्नों को उलट कर देखें तो पाएँगे कि महान व्यक्तियों ने खुद चिंतन-मनन करके अपने विषय में जाना तथा आवश्यकतानुसार अपने जीवन में सुधार करके दूसरों के समक्ष खुद को आदर्श रूप में प्रस्तुत किया। सफ़लता की तीव्र आकांक्षा वाला व्यक्ति ही यह कर सकता है।

वस्तुतः खुद को वक्त देने से ही व्यक्ति अपने आप को झकझोरता है और खुद से प्रश्न करता है। अपने प्रश्नों के उत्तर वह स्वयं ही खोजता है और फिर उन्हें कार्यरूप में कार्यान्वित करता है। इस तरह वह चुनौतियों का सामना करने की ताकत खुद ही जुटाता है। वह स्वयं ही अपना शिक्षक, मार्गदर्शक व परामर्शदाता होता है। यह तभी हो सकता है, जब व्यक्ति खुद को पर्याप्त समय दे क्योंकि स्वचिंतन ही उन्नति का प्रवेश द्वार है।


एक नई आशा के साथ फिर मिलेंगे . . . 

Saturday, 27 February 2016

जे कोऊ निंदा करे, आपनो बैरी होए

भावनाएँ घोड़े के समान होती हैं । जैसे एक घुड़सवार में घोड़े को अपने नियंत्रण में करने की पूरी क्षमता होती है, वैसे ही मनुष्य में अपनी भावनाओं को नियंत्रण में करने की ईश्वर-प्रदत्त क्षमता है । जिस प्रकार
एक घुड़सवार घोड़े को नियंत्रण में  तभी कर सकता है जब उसने इसका
प्रशिक्षण लिया हो या इस विषय में जान प्राप्त किया हो , उसी प्रकार
भावनाओं को नियंत्रण में वही व्यक्ति कर सकता है जिसने इसका ज्ञान
प्राप्त किया हो । वही व्यक्ति यह कर सकता है जो या तो योगा करता हो
या अपने भीतर ईश्वरीय सत्ता के दर्शन करता हो या ये बात भलीभाँति जानता और महसूस करता हो कि सकारात्मक सोच उन्नति का द्वार है ।
जो व्यक्ति दुर्भावनाओं के वशीभूत होकर रहता है, वह यहाँ-वहाँ निंदा ही
करता रहता है - कभी परिस्थितियों की, कभी समय की तो कभी अपने संपर्क में आने वाले लोगों की । ऐसा करने में उसे रसानुभूति होती है और
वो आनंद पाता है । वह इस बात से अनजान ही रहता है कि ऐसा करके
वह क्षणिक आनंद ही प्राप्त कर रहा है, चिरस्थायी नहीं । उसे ये भी नहीं मालूम कि ये क्षणिक आनंद उसे जीवन में नकारात्मक बनाता जा रहा है
और वह खुद ही अपनी खुशियों और सफलताओं के द्वार बंद कर रहा है
तथा दुखों, संकटों व असफलताओं को निमंत्रण दे रहा है । 
इस प्रकार जो व्यक्ति किसी की निंदा करता है वह खुद अपना शत्रु है । व्यक्ति निंदा तभी करता है जब वह किसी के प्रति ईर्ष्या या वैर-द्वेष रखता है और यह तभी होता है जब व्यक्ति भीतरी या आत्मिक रूप से दुर्बल हो या हीन भावना का शिकार हो ।
अतः जीवन में सफलता पाने के लिए भावनाओं रूपी घोड़े पर एक घुड़सवार
की भाँति बैठकर बुद्धि यानि ईश्वरीय-सत्ता में दृढ़ आस्था की लगाम से उन्हें अपने नियंत्रण में कीजिए और जिंदगी रूपी घुड़सवारी का आनंद लीजिए ।
एक नई आशा के साथ फ़िर मिलेंगे..........