Friday, 11 March 2016

विनम्रता और दीनता

विनम्रता को सभी ने श्रेष्ठ गुण सिद्ध किया है और मैं भी इससे पूर्णतया सहमत हूँ। विनम्रता वह आभूषण है जिससे व्यक्ति का व्यक्तित्व और निखरता है। चारित्रिक गुणों में विनम्रता को भी एक आवश्यक गुण माना
गया है। जो व्यक्ति विनम्र होता है, उसका सभी आदर-सम्मान करते हैं तथा वह सर्वत्र सराहना प्राप्त करता है । वह व्यक्ति ही विनम्र हो सकता  है जिसमें घमंड नाममात्र  भी न हो। विनम्रता का अर्थ है कि यदि कोई हमारे लिए कोई कार्य करे या हमारे कार्य में हमें सहयोग दे तो हम उसका आभार मानें और उसे हृदय से धन्यवाद कहें, यदि हमसे कोई गलती हो जाए तो हम उसे तुरंत मान लें और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगें और किसी की प्रशंसा भी हृदय की गहराइयों से करें। ऐसा करने में हम न तो हिचकिचाएँ न ही स्वयं को हीन मानें। यदि हम किसी को धन्यवाद नहीं कहते, किसी के प्रति कृतज्ञ नहीं होते या किसी की प्रशंसा नहीं करते या अपनी गलती कभी स्वीकार नहीं करते तो हम विनम्र नहीं बल्कि कठोर और घमंडी प्रवृत्ति के हैं और घमंडी व्यक्ति खुद अपना ही दुश्मन होता है क्योंकि नकारात्मक होने के कारण उसकी सोच विस्तृत नहीं होती, वह संकीर्ण ही होती है। ऐसी सोच से वह अपनी कामयाबी का खुद ही गला घोंट देता है।
    विनम्र होना अच्छा है किंतु अतिविनम्र होना घातक है । अतिविनम्रता
का अर्थ है- दीनता । इसे सरल शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति आपकी कृतज्ञता, आपके आभार को नहीं मानता या उसे आपकी कमज़ोरी मानता है तो ऐसे अवसरों पर सावधान रहें।यदि आप किसी से बार-बार विनम्रता से पेश आ रहे हैं और वह घमंड से फूला हुआ है तो यहाँ आपकी बार-बार की विनम्रता दीनता कहलाएगी। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि आप उस व्यक्ति के समक्ष अकड़ें। नहीं, बिल्कुल नहीं। ऐसे व्यक्ति से संपर्क कम करें । यदि आवश्यकता ही हो तो ऐसी कोशिश करें कि टकराव की स्थिति न आए, कार्य चौकन्ना होकर करें। किसी को भी यह अधिकार न दें कि वह आपको दीन या कमज़ोर समझे क्योंकि इससे आपकी आत्मछवि धूमिल होती है । अत: विनम्रता को अपनाएँ, दीनता को त्यागें ।
याद रखें कि अगर विनम्रता मखमली वस्त्र है तो दीनता पैबंद है ।


एक नई आशा के साथ फ़िर मिलेंगे..........

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